सबसे पहले बात इन गुजरातियों की जिन्होंने नई पीढ़ी को लोकतंत्र का महत्व समझाया। दैनिक भास्कर युवा जैसा उत्साह दिखाने वाले 100 साल अथवा उससे अधिक आयु को सभी मतदाताओं को प्रणाम करता है।
अब बात पहले चरण के मतदान की। औसतन 68 प्रतिशत मतदान हुआ है। संभवतः 3-4 प्रतिशत अभी बढ़ सकता है। 2012 में 71 प्रतिशत मतदान हुआ था। इस बार यह आंकड़ा बढ़े, ऐसा नहीं है। तो यह मतदान कुछ संदेश दे रहा है। अधिक मतदान एक ही स्थिति में होता है, जब लहर हो, यह लहर सत्ता के फेवर अथवा सत्ता के विरोध में हो सकती है। कारण कि अधिक मतदान उत्साह अथवा गुस्से का ही प्रतीक होता है। यही दो कारण हैं, जो मतदाताओं को मतदान करने के लिए आकर्षित करते हैं। कुछ सीटों को छोड़ दें तो स्पष्ट है कि पहले चरण में ऐसी कोई लहर देखने को मिली नहीं।
अब बात पहले चरण के मतदान की। औसतन 68 प्रतिशत मतदान हुआ है। संभवतः 3-4 प्रतिशत अभी बढ़ सकता है। 2012 में 71 प्रतिशत मतदान हुआ था। इस बार यह आंकड़ा बढ़े, ऐसा नहीं है। तो यह मतदान कुछ संदेश दे रहा है। अधिक मतदान एक ही स्थिति में होता है, जब लहर हो, यह लहर सत्ता के फेवर अथवा सत्ता के विरोध में हो सकती है। कारण कि अधिक मतदान उत्साह अथवा गुस्से का ही प्रतीक होता है। यही दो कारण हैं, जो मतदाताओं को मतदान करने के लिए आकर्षित करते हैं। कुछ सीटों को छोड़ दें तो स्पष्ट है कि पहले चरण में ऐसी कोई लहर देखने को मिली नहीं।
...तो इसका क्या मतलब निकलता?
मतदान बाद बीजेपी और कांग्रेस दोनों अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। करेंगे ही, करना भी चाहिए। जो आंकड़े और रिपोर्ट आए हैं, उसके मुताबिक सूरत में 70 प्रतिशत मतदान हुआ। सूरत सबसे अधिक जीएसटी से प्रभावित जिला है। पिछली बार भी यहां लगभग इतना ही मतदान हुआ था। अर्थात् जीएसटी का असर यहां नहीं रहा? अब बात दूसरे बड़े मुद्दे- पाटीदार आंदोलन की। पटेल फैक्टर मोरबी और राजकोट-सूरत की कुछ सीटों के अलावा बाकी जगहों पर कमजोर ही दिखाई दिया। मोरबी-टंकारा में जरूर निर्णायक भूमिका में देखने को मिलेगा। मोरबी में 75 प्रतिशत मतदान हुआ। सूरत की सबसे अधिक मात्र पटेल प्रभावित सीटों पर इस मुद्दे का असर देखने को मिला है।
मतदान बाद बीजेपी और कांग्रेस दोनों अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। करेंगे ही, करना भी चाहिए। जो आंकड़े और रिपोर्ट आए हैं, उसके मुताबिक सूरत में 70 प्रतिशत मतदान हुआ। सूरत सबसे अधिक जीएसटी से प्रभावित जिला है। पिछली बार भी यहां लगभग इतना ही मतदान हुआ था। अर्थात् जीएसटी का असर यहां नहीं रहा? अब बात दूसरे बड़े मुद्दे- पाटीदार आंदोलन की। पटेल फैक्टर मोरबी और राजकोट-सूरत की कुछ सीटों के अलावा बाकी जगहों पर कमजोर ही दिखाई दिया। मोरबी-टंकारा में जरूर निर्णायक भूमिका में देखने को मिलेगा। मोरबी में 75 प्रतिशत मतदान हुआ। सूरत की सबसे अधिक मात्र पटेल प्रभावित सीटों पर इस मुद्दे का असर देखने को मिला है।
कम मतदान किस लिए?
- पहली बार 18 से 35 साल की आयु के युवाओं की संख्या 40 प्लस लोगों की तुलना में अधिक है। युवावर्ग ही विद्रोह, विरोध और विकास के साथ सबसे अधिक जुड़ा होता है। सबसे अधिक आशा भी यही रखते हैं। परंतु उन्होंने जातियों को लड़ते देखा। गांधी-पटेल के गुजरात के नेताओं को नीच, औरंगजेब-खिलजी जैसी बातें करते देखा।
- पहली बार 18 से 35 साल की आयु के युवाओं की संख्या 40 प्लस लोगों की तुलना में अधिक है। युवावर्ग ही विद्रोह, विरोध और विकास के साथ सबसे अधिक जुड़ा होता है। सबसे अधिक आशा भी यही रखते हैं। परंतु उन्होंने जातियों को लड़ते देखा। गांधी-पटेल के गुजरात के नेताओं को नीच, औरंगजेब-खिलजी जैसी बातें करते देखा।
- विकास की बातों से भटककर धर्म और अस्मिता को मुद्दा बनाते देखा। उनके भविष्य की बातें करने के बदले भाजपा और कांग्रेस अपने भविष्य और भूतकाल की बातें करने लग गए। प्रचार का मुद्दा ही खो गया था।
- शुरुआत में जीएसटी और नोटबंदी की बातें हो रही थीं। रास्ता, बिजली, पानी, नौकरी, चिकित्सा, शिक्षा के वादे किए जा रहे थे। पटेलों को आरक्षण के फेवर और विरोध में दलीलें दी जा रही थी। परंतु अचानक सुनहरे सपने दिखाते-दिखाते मंदिरों की राजनीतिक खेलने लगे अौर जनेऊ दिखाने लगे। खुद को असली और दूसरे को नकली हिंदू साबित करने की स्पर्धा शुरू हो गई।
- और अंतिम चरण आते-आते नीच, पापी, औरंगजेब, खिलजी, बाबर और अफजल का उल्लेख होने लगा। संकेत स्पष्ट है कि युवा इस दिशाहीन मुद्दों से प्रभावित नहीं हुआ। ऐसा किसलिए हुआ? क्या कांग्रेस विकास के मुद्दे पर मतदाताओं का ध्यान खींचने में असफल रही थी? या भाजपा विकास के सवालों से बचना चाहती थी?
- यद्यपि, अब नजर दूसरे चरण के 14 दिसंबर के मतदान पर है। गुजरात का एक भाग जब 70 प्रतिशत तक पहुंच सकता है तो दूसरा भाग जरूर उससे आगे निकलेगा। निकलना भी चाहिए कारण कि अपने पास यह अवसर पांच साल बाद आएगा।
- यद्यपि, अब नजर दूसरे चरण के 14 दिसंबर के मतदान पर है। गुजरात का एक भाग जब 70 प्रतिशत तक पहुंच सकता है तो दूसरा भाग जरूर उससे आगे निकलेगा। निकलना भी चाहिए कारण कि अपने पास यह अवसर पांच साल बाद आएगा।


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