राकेश वर्मा, ग्वालियर। दीपावली पर ग्वालियर-चंबल अंचल में शिवाजी की वीरता और साहस को याद करने की अनूठी परंपरा सालों से चली आ रही है। दीपोत्सव पर बेटों को वीर शिवाजी महाराज की तरह साहसी बनाने और बेटियों में महालक्ष्मी का स्वरूप जागृत करने के लिए किले की पूजा की जाती है। किले के पूजन के माध्यम से बेटों को जहां वीर शिवाजी जैसा बनने की शिक्षा दी जाती है। वहीं बेटियों को घरकुल के माध्यम से प्रकृति को सहेजना भी सिखाया जाता है।
दीपावली पर सिंधिया घराने के जयविलास पैलेस सहित अंचल में किले की पूजा के लिए किलों की प्रतिकृति की जमकर खरीदारी होती है। पैलेस सहित आम लोगों ने भी पूजने के लिए घर के बाहर भी किले की प्रतिकृति बनवाई है। किलों के पूजन की यह मराठा परंपरा अंचल से राजस्थान के धौलपुर तक देखने को मिलती है। सिंधिया घराने के राजपुरोहित चंद्रकांत शैंडे के अनुसार धर्म की रक्षा के लिए अपना संपूर्ण समर्पित करने वाले वीर शिवाजी जैसा सहासी बनने की शिक्षा बच्चों को 5 वर्ष की उम्र से ही खेल-खेल में दी जाना शुरू कर दी जाती थी।

इसके लिए प्रत्येक घर में किला बनाया जाता था। इसमें बेटों को किले की सुरक्षा करने के साथ ही युद्ध जीतने के लिए नई-नई रणनीति तैयार करने की शिक्षा दी जाती थी। बेटियों के लिए किले को (घरकुल) बना दिया जाता था। बेटियां घर को कैसे प्रकृति के साथ संतुलन बनाते हुए स्वर्ग जैसा बना सकें, इसकी शिक्षा लेती थीं।
धर्म के अनुसार जीवन जीने की कला सीखते हैं बच्चे

ज्योतिषाचार्य पं. जीएम हिंगे ने बताया कि हिंदू धर्म प्रकृति के साथ संतुलन बनाते हुए जीवन जीने की कला सिखाता है। इस किले के पूजन में भी प्रकृति की पूजा और गृहस्थी के संस्कार दिए जाते हैं। किले के अंदर कई प्रकार के पशु, पक्षी, पेड़, पौधों के खिलौने होते हैं। इनके माध्यम से बधाों को सिखाया जाता है कि सभी पशु व पक्षी प्रकृति के लिए महत्वपूर्ण हैं। अगर इनमें से कोई भी कम या अधिक होता है तो प्रकृति का पूरा संतुलन बिगड़ जाएगा।
महाराज करते थे पूजा

पैलेस में माधौ महाराज प्रथम के समय से यह पूजा होती चली आ रही है। अगर सिंधिया परिवार का कोई सदस्य ग्वालियर में नहीं होता है तब इसका पूजन राजपरिवार के राजपुरोहित चंद्रकांत शैंडे द्वारा किया जाता है।